चीन भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्राजील से अधिक उत्पादन करता है, जो क्रमशः दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। फिर भी, चीन पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। 2025 में, देश ने खाद्य और कृषि उत्पादों का लगभग 185 अरब यूरो का आयात किया, जबकि निर्यात लगभग 90 अरब यूरो था। देश अपने निर्यात से कहीं अधिक खाद्य और कृषि उत्पाद आयात करता है।
निर्भरता
विशेष रूप से सोयाबीन (पशु आहार) इस निर्भरता को दर्शाते हैं। चीन ने पिछले वर्ष लगभग 112 मिलियन टन सोयाबीन का आयात किया, जिसकी कीमत 50 अरब डॉलर से अधिक है। मांस, अनाज, वनस्पति तेल, फल, मेवे और डेयरी उत्पाद भी बड़े पैमाने पर आयात किए जाते हैं। इस मामले में ब्राजील एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है।
बीजिंग विदेशी खाद्य उत्पादकों पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश नहीं की जा रही है, बल्कि आयात को विभिन्न देशों में फैलाने का भी प्रयास हो रहा है। चीन विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका पर निर्भरता कम करना चाहता है और इसलिए वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की सक्रिय खोज कर रहा है।
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आधुनिकीकरण
घरेलू उत्पादन बढ़ाना सहज नहीं है। उपलब्ध कृषि भूमि की मात्रा सीमित है और जल संकट एक समस्या है। इसलिए चीन बेहतर बीज, आधुनिक मशीनें, अधिक कुशल सिंचाई और नई कृषि तकनीकों के जरिए समान भू-क्षेत्र से अधिक भोजन प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है।
खाद्य मूल्य
इसी समय, अंतरराष्ट्रीय खाद्य बाजार में जोखिम बढ़ रहे हैं। FAO चेतावनी देता है कि इस वर्ष के अंत तक खाद्य कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। बढ़ती तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें, महंगी उर्वरक और डीजल आपूर्ति में बाधाएं किसानों, परिवहनकों, खाद्य प्रसंस्कर्ताओं और अन्य व्यवसायों के लिए लागत बढ़ा रही हैं।
इसमें एल नीनो भी शामिल है। बदलते वर्षा पैटर्न अक्सर कई प्रमुख कृषि क्षेत्रों की फसलों को प्रभावित कर सकते हैं। भारत में विलंबित मानसून पहले से ही चावल उत्पादन को लेकर चिंतित कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया में सर्दियों की फसल में 21 प्रतिशत की कमी की उम्मीद है, जिसका कारण ईंधन और उर्वरक लागत में वृद्धि है।
भू-राजनीति
चीन के लिए इन सबका मतलब यह है कि बड़ी घरेलू कृषि उत्पादन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से पूरी सुरक्षा प्रदान नहीं करता। देश विश्व बाजार पर बड़े पैमाने पर खाद्य और कृषि कच्चे माल के लिए निर्भर रहता है, जबकि वहीं भू-राजनीतिक संघर्ष, उच्च उत्पादन लागत और प्रतिकूल मौसम परिस्थितियां अनिश्चितता और बढ़ा रही हैं।

