फ्रैंकफर्ट ए/डी ओडर की अदालत में एक जर्मन मधुमक्षक और उसके पड़ोसी, एक जर्मन किसान के बीच पहला दीवानी मुकदमा शुरू हुआ, जो अपने खेतों पर ग्लाइफोसेट का छिड़काव करता था। इस कारण शहद में अत्यधिक मात्रा में रासायनिक पदार्थ पहुंच गए।
ग्लाइफोसेट के उपयोग और दूषित शहद के संबंध में इस दीवानी मुकदमे में मंगलवार को संबंधित पक्षों ने पहली बार मामले की तथ्यात्मक और कानूनी स्थिति पर चर्चा की। मधुमक्षक सेबास्टियन स्यूजिंग ने बिक्री के लिए अनुपयुक्त हो चुके दूषित शहद की हर्जाने के तौर पर 70,000 यूरो की मांग की है। कुल मिलाकर चार हजार किलो से अधिक शहद और मोम नष्ट करना पड़ा।
मुकदमे की शुरुआत में मुख्य रूप से मोबाइल मधुमक्खी के छत्तों के सटीक स्थान और क्या मधुमक्षक के पास इसका सही किरायानामा था, इस पर चर्चा हुई। यद्यपि उसे वन विभाग से छत्ते को वन क्षेत्र में रखने की अनुमति मिली थी, पर पता चला कि वे शायद किसी और जगह पर थे। किरायानामा अब स्वामित्व अधिकार को स्पष्ट करेगा।
इसके अलावा विवाद यह था कि किसे किसे विषैले पदार्थ के उपयोग या मधुमक्खी के छत्ते लगाने की सूचना देनी चाहिए थी। यदि अदालत मधुमक्षक के पक्ष में फैसला देती है, तो यह निर्णय एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है, क्योंकि अब तक मधुमक्षक आमतौर पर बाहरी कारणों से हुए नुकसान के खर्च खुद वहन करते आए हैं।
मुकदमे की शुरुआत में न्यायाधीश ने कहा कि वह सबसे जल्दी 14 सितंबर को फैसला सुनाएंगे, और ग्लाइफोसेट उपयोग से हुए नुकसान पर कोई सामान्य निर्णय नहीं देंगे।
फिर भी न्यायाधीश ने विशेष परिस्थितियों के कारण हर मामले को अलग-अलग देख कर फैसला देने का संकेत दिया, और ग्लाइफोसेट के उपयोग पर कोई समग्र राय नहीं बनाएंगे। नए तथ्य इसे कितना बदल सकते हैं, यह अभी देखना होगा।
इस बीच, स्यूजिंग दंपति ने घाटे के कारण मधुमक्खी पालन छोड़ दिया है। अब वे एक जैविक फार्म में काम कर रहे हैं।

