नई जर्मन विश्वविद्यालय की एक अध्ययन के अनुसार, खाद्य की बढ़ती लागतों के कारणों में ऊर्जा लागत, भू-राजनीतिक तनाव, श्रम कमी और जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों की असफलता शामिल हैं।
विडम्बना यह है कि खाद्य उत्पादन स्वयं जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण है। को2-प्राइसिंग और कृषि की स्थिरता जैसी उपायों से लागत बढ़ती है जो उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं दोनों को प्रभावित करती है। प्रश्न यह है: खाद्य उत्पादन पर ये जलवायु नियम कौन भुगतेगा?
पॉट्सडैम जलवायु अनुसंधान संस्थान (PIK) की एक अध्ययन के अनुसार, क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखलाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अमीर देशों जैसे अमेरिका में कृषि लागत कुल खाद्य मूल्य का 20% से कम है, जबकि दक्षिणी सहारा के अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में यह 70% तक है। यह अंतर दर्शाता है कि खाद्य श्रृंखलाएं विश्व स्तर पर कैसे काम करती हैं।
प्रसंस्कृत उत्पादों की खपत का बड़ा पारिस्थितिक पदचिह्न होता है। अमीर देश अपने निवासी लक्ज़री उत्पादों और बाहर खाने पर अधिक खर्च करते हैं, जबकि गरीब देशों में बुनियादी खाद्य वस्तुएं आय का बड़ा हिस्सा निगल जाती हैं। इसलिए, जलवायु उपायों का प्रभावित प्रभाव निम्न-आय वाले देशों के उपभोक्ताओं पर अधिक पड़ता है। इन क्षेत्रों के उत्पादक मूल्य वृद्धि को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाते हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा होता है।
PIK अध्ययन ने दो परिदृश्य सिमुलेट किए: एक जिसमें जलवायु उपाय सख्ती से लागू किए जाते हैं और एक जिसमें सब कुछ जैसा है वैसा ही रहता है। अमीर देशों में 2050 तक उपभोक्ताओं की कीमतें 1.25 गुना बढ़ती हैं, जबकि गरीब देशों में कीमतें 2.73 गुना और उपभोक्ता कीमतें 2.45 गुना तथा उत्पादक कीमतें 3.3 गुना बढ़ जाती हैं।
बिना महत्वाकांक्षी जलवायु उपायों के, चरम मौसम की स्थितियां और बाधित आपूर्ति श्रृंखलाओं के कारण विश्व की जनसंख्या को खाद्य की और अधिक उच्च कीमतों का सामना करना पड़ सकता है। स्थायी कृषि में निवेश और उचित CO2-प्राइसिंग इन चुनौतियों को पार करने में मदद कर सकते हैं। कमजोर जनसँख्या और क्षेत्रों के लिए वित्तीय सहायता इस संक्रमण को न्यायसंगत बनाने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है, यह जर्मन अध्ययन निष्कर्षित करता है।

